आपके शिशु का पहला शब्‍द- एक अंतर्दृष्टि

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आपके शिशु का पहला शब्‍द- एक अंतर्दृष्टि

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आपका शिशु बातचीत की तैयारी कर रहा हैजन्‍म लेने के समय से ही आपका शिशु आपके साथ अपनी मौलिक जरूरत को लेकर बातचीत करना शुरू कर देता है। जन्‍म लेने पर आपके शिशु द्वारा पहली बार रोने का अर्थ है ''सुनिए, मुझे ठंढ लग रही है!" अपने उसकी आवश्यकताओं का उत्तर देते हुए  उसे गरमाहट प्रदान  किया। यह आपके शिशु की बातचीत का पहला रूप था। जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ती जाएगी, वह आवाज उत्‍पन्‍न करना शुरू करेगा, शब्‍दों को समझकर उसका इस्‍तेमाल करेगा और आगे जटिल बातचीत में हिस्‍सा लेने लगेगा। इस सब के लिए आपको लंबा इंतजार करना नहीं पड़ेगा!

जन्‍म से 3 महीने तक 

आपके शिशु के जीवन के प्रारंभिक कुछ सप्‍ताह के दौरान, आप दोनों एक-दूसरे को जानने-समझने लगते हैं। जब आपका शिशु रोता है, तो वह अपने स्‍वर के स्‍तर में बदलाव करता है ताकि अपनी जरूरत को बता सके। आप जानने लगते हैं कि शिशु को भूख लगी है, वह दिक्‍कत महसूस कर रहा, भीगा है, थका है या आप उसके रोने की आवाज के अंतर से उसके संदेश को समझते हैं।

आपका नवजात आवाज सुनकर चौंकता या शोर से जग जाता है। 3 दिन का होने पर वह अपनी मां की आवाज को पहचानने में सक्षम हो जाता है और यहां तक कि मां की आवाज सुनकर रोना बंद कर देता है।  9वें दिन वह अपनी आंखों से आवाज का पता लगाने की कोशिश करना प्रांरभ कर सकता है। वह अपने सिर को मां की आवाज की दिशा में मोड़ सकता है और अगर वह कोई अनजान ध्‍वनि सुनता तो अपनी गतिविधि को बंद कर देता है।

जन्‍म से करीब 3 महीने तक, हो सकता है कि आपके शिशु ने बार-बार स्‍वर-जैसी ध्‍वनि निकालना सुना जा सकता है।  इसे 'कुइंग' कहते हैं और यह बोलने की प्रक्रिया 'वोकल प्‍ले' की शुरूआत है। वोकल प्‍ले अंततः स्पीच ध्वनियों के उपयोग में बदल जाता है। शोध बताते हैं कि कोई भी शिशु किसी भी भाषा को सीखने और उपयोग करने की क्षमता के साथ जन्‍म लेता है। निश्चित रूप से आपका बच्‍चा केवल वही भाषा समझता और इस्‍तेमाल करता है जिसे वह सबसे ज्‍यादा सुनता है।

तीन महीने के अंदर आपका शिशु मुस्‍कुराना शुरू कर सकता है। ऐसे सकारात्‍मक संबंध के बाद, आप शब्‍दों और चेहरे के हाव-भाव का उपयोग करके अपने शिशु के साथ अधिक बातचीत करेंगे ताकि वह और मुस्कुरा सके।वह आपके द्वारा बातचीत करने पर मुस्‍कुरा कर और ध्वनियाँ निकालकर उत्तर दे सकता है। अपने शिशु की कुइंग की नकल करें इससे उसे पता चलता है कि आप उसे सुन रहे हैं, परिणामस्‍वरूप उसे प्रोत्‍साहन मिलता है। आपको अपने बोध का पालन करना चाहिए और भाषा मॉडलिंग प्रक्रिया की शुरुआत करने के लिए इन ध्‍वनियों को दोहराना चाहिए।

साथ ही इस आयु में कई तरह के मौखिक का उतार-चढ़ाव प्रतिरूप का इस्‍तेमाल किया जाता है और आपका बच्‍चा आपकी आवाज की परिवर्तन और स्‍वर को व्‍यक्‍त करना सीखता है। वह आपके शब्‍दों के बीच के अंतर को पहचानने लगता है, उदाहरण के लिए जब आप कोई प्रश्‍न पूछते हैं या कोई बात कहते हैं।

बोलने के कौशल को प्रोत्‍साहन देने के लिए आप क्‍या कर सकते/ हैं?

इस अवस्‍था में शिशु माता-पिता के स्‍पर्श, चेहरे की अभिव्‍यक्ति और बोलचाल से अपने को उनके शब्‍दों से कहीं ज्‍यादा अनुकूलित कर लेता है।  जब अपने शिशु से बात करें तो अपने चेहरे के हाव-भाव और स्वरमान को बदलने पर ध्‍यान केंद्रित करें।

4 से 6 महीने 

4 महीने के करीब आपका शिशु 'नहीं' में प्रत्‍युत्‍तर देना शुरू कर देता है। अब वह नई ध्‍वनियों के स्रोत को आसपास देखने और संगीत के प्रति आकर्षित होने में सक्षम होता है। 4 से 6 महीने के बीच बड़बड़ाना आरंभ हो जाता है। बड़बड़ाहट तब होती है जब आपका शिशु बोली की तरह के स्‍वर और व्‍यंजन जैसे कि ''पी'', ''बी'' और ''एम'' आदि का इस्‍तेमाल करता है। आप शिशु को अकेले में या अपने साथ खेलने के दौरान बड़बड़ाते पाएंगे।

हाव-भाव में विकास भी समान रूप से महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि इससे भाषा विकास का अच्‍छा मार्ग प्रशस्‍त होता है। करीब 6 महीने की आयु में एक शिशु अपनी पसंद और जरूरत के बारे में संचार करना आरंभ कर देता है जोकि हाव-भाव (पहुंचने की कोशिश आदि) के द्वारा होता है। शोध बताते हैं कि शिशु अपने माता-पिता से बातचीत के लिए संकेत भाषा को तब सीख लेते हैं सकता है जब वह एक शब्‍द तक बोलने में सक्षम नहीं हुआ हो!

7 से 12 महीने 

7 से 12 महीने के बीच आपका बच्‍चा लुकाछिपी जैसे खेल का आनंद लेना शुरू कर देता है। वह अपना नाम और सामान्‍य शब्‍दों (जैसे कि ''कप'', ''डायपर'') की पहचान करना सीखेगा। दिशा के प्रति उसका ज्ञान बढ़ रहा है और वह अनुरोध जैसे कि '' और चाहिए ?" पर अपनी प्रतिक्रिया देना आरंभ कर देता है। साथ ही उसकी बड़बड़ाहट में ध्‍वनि के छोटे समूह जैसे कि '' अपअप, गागागागा'' आदि शामिल हो जाते हैं। ये बड़बड़ाहट ही वह रूप है जिसे हम शब्‍द के रूप में जानते हैं। हालांकि शब्‍द स्‍पष्‍ट नहीं भी हो सकते हैं, लेकिन अगर आपका बच्‍चा एक वस्‍तु या इच्‍छा के लिए समान ध्‍वनि दोहराता है तो इसे ''अर्थपूर्ण शब्‍द'' माना जा सकता है। उदाहरण के लिए अगर आपका बच्‍चा हमेशा ''मो'' कहकर ज्‍यादा पाने की इच्‍छा का संकेत करे तो इसे एक अर्थपूर्ण शब्‍द के रूप में स्‍वीकार किया जा सकता है।

12 महीने के होने तक अधिकतर शिशु अपने गड़गड़ एक या दो शब्‍दों जैसे कि ''दादा, बाय-बाय'' या ''ममा'' का निर्माण कर लेते हैं! 12 महीने की छोटी अवधि में एक शिशु बाहरी दुनिया से बात करने की क्षमता का विकास प्रारंभ कर देता है। प्रथम शब्‍द बोलने के उसके चौंकाऊ प्रत्‍युत्‍तर से बोली और भाषा कौशल तक का विकास तेजी से होता है। मस्तिष्‍क विकास पर आधारित शोध बताता है कि जन्म से 3 वर्ष तक की आयु में तेज विकास शुरू हो जाता है। अपने शिशु से अक्‍सर बात करके उसके बोलने के कौशल को बेहतर बनाएँ।

इस अवधि में आपका बच्‍चा एक भाषा सीखने के लिए तैयार और तत्‍पर होता है और उसके इस कौशल में निखार लाने वाले आप सबसे बेहतर स्रोत होते हैं। एक उन्‍नत भाषा सीखने वाला माहौल देकर आप अपने शिशु को वह कौशल दे रहे हैं जो उसके साथ जीवन भर रहेगा!

चेतावनी संकेत 

 विकास संबंधी लक्ष्य का उपयोग यह जानने के लिए किया जाता है कि प्रारूपिक तौर पर एक बच्‍चा आयु विशेष में क्‍या-क्‍या गतिविधि करता है। हर बच्‍चा भिन्‍न होता है और वह इन लक्ष्य को निर्दिष्‍ट समय से पहले या बाद में प्राप्‍त कर सकता है। हालांकि, इस आयु समूह के लिए, आपको चिंतित होना चाहिए जब:

  • आपका बच्‍चा ध्‍वनि करने पर चौंकता नहीं हो या कोई प्रत्‍युत्‍तर नहीं देता हो।
  • 3 महीने की आयु होने तक आपका शिशु ध्‍वनि के स्रोत या आपकी आवाज की ओर नहीं मुड़ता है।
  • 8 महीने की आयु तक आपका शिशु बड़बड़ाने की आवाज नहीं करता है, बोली ध्‍वनि की नकल या आपका ध्‍यान आकर्षित करने के लिए कोई आवाज नहीं निकालता है।
  • 8 से 12 महीने के बीच आपका बच्‍चा लोगों की बातचीत का प्रत्‍युत्‍तर नहीं देता या बातचीत के प्रति रुचि प्रदर्शित नहीं करता है।

अगर आपको अपने बच्‍चों की श्रवण प्रक्रिया/ बोली/भाषा को लेकर कोई चिंता हो तो इसके बारे में अपने शिशु चिकित्‍सक से चर्चा करें।श्रवण, बोली या भाषा की दिक्‍कतों की शुरुआती पहचान महत्‍वपूर्ण होती है। समस्‍या की पहचान शुरु में हो जाने से न सिर्फ बोली और भाषा विकास में सहायक हो सकता है, बल्कि आचरण, सामाजिक मेल-जोल और अकादमिक क्षेत्र की भविष्‍यगत समस्‍याओं को रोकती है।