अनुसंधान और शिशुओं की सांकेतिक भाषा के लाभ

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अनुसंधान और शिशुओं की सांकेतिक भाषा के लाभ

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शिशुओं की सांकेतिक भाषा माता-पिता, पारिवारिक और बच्चों की देखभाल में लगे कार्यकर्ताओं को बोलने में अक्षम शिशुओं से संवाद करने में उनकी सहायता करने के लिए सरल सांकेतिक भाषा या इशारों के उपयोग की पद्यति है।हो सकता है आपको लगे कि आप पहले से ही कुछ बुनियादी बातों का प्रयोग कर रहे हैं।कई अध्ययनों में शिशुओं को सांकेतिक भाषा सिखाने से होने वाले अत्याधिक लाभ रेखांकित किये गए हैं।

  • सांकेतिक भाषा आपके शिशु में बोलने की क्षमता विकसित होने से पहले उसे आसपास के लोगों से संवाद करने में सक्षम बनाती है।यह उन्हें उन विषयों के बारे में वार्तालाप शुरू करने में सक्षम बनती है, जिनमें उन्हें रूचि होती है।इसके अलावा, यह भाषा की अनुपस्थिति और बोली जाने वाली भाषा के बीच पुल का काम करती है।
  • यह आपकी और आपके बच्चे, दोनों की हताशा को कम कर सकती है।सांकेतिक भाषा से आपका शिशु आपको बता सकता है कि वह क्या चाहता है, क्या गड़बड़ है या उसे क्या परेशान कर रहा है, जो आपके बच्चे का तनाव,  निराशा, गुस्सा कम और रोना बंद कर दे।यदि आपका बच्चा अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की जानकारी आप तक पहुंचा सकता है, तो इसका मतलब यह है कि आपको उनकी रोने का मतलब समझने की कोशिश करने की ज़रूरत नहीं है।
  • सांकेतिक भाषा माता-पिता और बच्चे के आपसी संबंधों को समृद्ध करती है।सांकेतिक भाषा की प्रकृति से आप और आपका शिशु एक-दूसरे को प्रतिक्रिया दे सकते हैं।संकेतों के माध्यम से आप शिशु से दिन प्रतिदिन का पारस्परिक लेनदेन कर सकते हैं, जिससे अंततः दो-तरफा वार्तालाप पैदा होता है।

  • इससे आपको अपने शिशु का मन और वास्तव में उन्हें समझने में मदद मिलती है. शिशुओं की सांकेतिक भाषा की मदद से आपका शिशु अपनी रूचि की चीज़ों के बारे में आपसे बातचीत कर सकता है। इससे आप यह भी समझसकते हैं कि वे क्या सोचते हैं, वे किस चीज़ में रुचि रखते हैं और उनके दृष्टिकोण से दुनिया कैसी दिखती है।यह सब तब होता है जब आपका शिशु अभी बोल भी नहीं सकता है!

  • सांकेतिक भाषा  से बौद्धिक विकास और स्मृति में भी सुधार होते हैं सांकेतिक भाषा बच्चों को मोहित करती है और अकसर शामिल होने पर सिखाए जाने वाले कार्यों पर अधिक ध्यान देते हैं। यह भी साबित हुआ है कि जब बच्चे कोई शब्द संकेत के साथ संयोजन के रूप में सीखते हैं, तो उनको शब्द का अर्थ याद रखने की अधिक संभावना होती है।

  • सांकेतिक भाषा सीखने से बोलने की प्रक्रिया भी तेज़ होती है।शोध से पता चला है कि सांकेतिक भाषा उपयोग करने वाले बच्चे दूसरे बच्चों की तुलना में बोली जाने वाली भाषा अधिक तेज़ी से सीखते हैं।

  • सांकेतिक भाषा बच्चे का आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान और आत्म अभिव्यक्ति भी बढ़ा सकती है।सांकेतिक भाषा के माध्यम से अपनी जरूरतें, इच्छाएं और रुचियाँ बताने की शिशु की क्षमता के कारण शिशु का आत्मविश्वास बढ़ सकता है।

  • शिशु की सांकेतिक भाषा से   मस्तिष्क विकास तेज़ हो सकता है और संभवतया आपके शिशु का बौद्धिक गुणक भी बढ़ सकता है। शोध से प्रमाणित हुआ है कि संकेत प्रयोग करने वाले शिशुओं का परम्परागत तरीके से बोलने वाले शिशुओं की तुलना में भविष्य में बौद्धिक गुणक टेस्ट में बेहतर स्कोर होता है।सांकेतिक भाषा सीखते समय आप मस्तिष्क के दाएं और बाएं गोलार्ध, दोनों का उपयोग करते हैं, जबकि बोली जाने वाली भाषा सीखते समय आप केवल मस्तिष्क के बाएं गोलार्ध का उपयोग करते हैं।सांकेतिक भाषा सीखते समय आप मस्तिष्क के दाएं और बाएं गोलार्ध, दोनों का उपयोग करते हैं, जबकि बोली जाने वाली भाषा सीखते समय आप केवल मस्तिष्क के बाएं गोलार्ध काउपयोग करते हैं।

  • अपने शिशु को संकेत सिखाकर आप उसे दूसरी भाषा सिखा रहे होते हैं।जो बच्चे इस संकेत भाषा सीखते और इसका अभ्यास करते हैं, वे व्यवहारिक रूप में द्विभाषी होते हैं।मस्तिष्क पर किये गए अनुसंधान से पता चलता है कि भाषाईकौशल सर्वोत्तम रूप से शिशु जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में प्राप्त किया जाता है।तो फिर देर कैसी, आगे बढ़ें और अपने शिशु को इस अद्भुत अनुभव का उपहार दें!